देश का नेतृत्व करने वाले नेतावो के ऊपर देश को सही दिशा में ले जाने की जिम्मेदारी है !



"कल्पना कीजिये की हम सब एक बस पर सवार हैं और बस कहीं तो भी जा रही है, कहाँ जा रही है इससे किसी को कोई मतलब नहीं, सब अपनी अपनी जगह बनाने में व्यस्त हैं ; सब का ध्यान केवल अपने परिक्षेत्र और उसके विस्तार पर है ! आज भारत की यही परिस्थिति है।
भारत वह बस है और हम सवा सौ करोड़ जनता इसकी सवारी ; सब को अपनी अपनी पड़ी है किसी को इस बात से कोई मतलब नहीं की देश कहाँ जा रहा है ..सब के लिए महत्वपूर्ण उनकी सीट और सहूलियतें हैं , ऐसे में, देश को यह कौन समझाए की भले ही आज हम हेंन केन प्रकरेण बस के अंदर अपने लिए अच्छी जगह बना भी लें पर अगर बस ही गलत रास्ते पर चल रही हो तो हम अपने गंतव्य तक कैसे पहुँच पाएंगे ?


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अगर बात केवल चलते रहने की है तो अलग बात है पर क्या हम रास्ते की अनदेखी कर अपने गंतव्य तक पहुँच पाएंगे ? यह आज हम सब के सोचने का विषय है ! अतः हम चालक की भूमिका और प्रदर्शन को अनदेखा नहीं कर सकते।
देश का नेतृत्व करते नेता ही वह चालक हैं जिनके ऊपर देश को सही दिशा में ले जाने की जिम्मेदारी है पर जब तक आपस में ही व्यस्त रहेंगे हमें यह मालूम ही नहीं चलेगा की हम सही दिशा में जा रहे हैं या नहीं !

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किसी भी गिलास का मह्त्व उसके खालीपन से होता है क्योंकि जब वह किसी चीज़ से भरा हो तो मह्त्व उस चीज़ का होता है जिससे गिलास भरा है। ऐसे में, यह देखने वाले की मानसिकता पर निर्भर करता है की वह पानी से आधे भरे गिलास को कैसे देखे, आधा भरा -आधा खली या आधा हवा से भरा और आधा पानी से , दोनों में से कोई भी निष्कर्ष गलत नहीं हाँ, पर निष्कर्ष की विभिन्नता दृष्टिकोण और व्यक्ति की मानसिकता का परिचय अवश्य देता है।
जब गिलास आधा पानी और आधा हवा से भरा मान लिया जाएगा तो उसमें नए की सम्भावना ही नहीं बचेगी इसलिए बेहतर यह होगा की क्यों न हम गिलास को आधा भरा और आधा खाली माने !!
इस उदाहरण के माध्यम से मैं बस इतना ही स्पष्ट करना चाहता हूँ की समाज अपने नेतृत्व का दायित्व कैसी मानसिकता को सौंपता है यह उसकी संभावनाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण है ; अगर सामाजिक नेतृत्व ही कुंठित हो तो समाज में कुंठा स्वाभाविक है , इसलिए, परिस्थितियों की वास्तविकता के आधार पर समय समय पर देश, समाज और नेतृत्व की समीक्षा आवश्यक हो जाती है ; यही किसी भी प्रगतिशील समाज की वास्तविक अर्थों में पहचान है।
जब व्यक्तिगत आकांक्षाएं समय की आवश्यकताओं पर भारी पड़ने लगती हैं तो समाज में घर्षण स्वाभाविक है, ऐसी किसी परिस्थिति से निपटने के लिए महत्वपूर्ण यह नहीं की कौन क्या सोचता है और समझता है बल्कि मह्त्व इस बात का होना चाहिए की देश और समाज की भलाई किसमे है;
इससे अधिक और क्या कहूं, सभी समझदार हैं और समझदारों के लिए इशारा ही काफी !"