
"शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति में सोचने और समझने की क्षमता का विकास करना है और यही शिक्षा द्वारा अर्जित ज्ञान की सही अर्थों में उपयोगिता भी, पर जब शिक्षा ही अपने उद्देश्य से भ्रमित हो जाए तो हम एक आदर्श समाज का निर्माण भला कैसे कर सकेंगे ?
आज शिक्षा का मह्त्व केवल जीविका-उपार्जन की दृष्टि से एक सुरक्षित जीवन के आश्वासन के रूप में रह गया है; न सीखना महत्वपूर्ण रहा और न ही ज्ञान , तभी शिक्षा खुद एक व्यवसाय बन गयी है।
ज्ञान की भी एक सीमा है पर कल्पनाओं की कोई सीमा नहीं और इसीलिए शिक्षा के माध्यम से कल्पनाशक्ति को ज्ञान का बल प्रदान करना ही किसी भी नए सम्भावना का मूल स्त्रोत है, तभी तो, कल्पनाओं में ही नए को जन्म देने का सामर्थ है न की तार्किक क्षमता में , पर जब व्यवहारिकता के नाम पर लोग इतने समझदार हो जाएँ की सुनना, सोचना और समझना छोड़ दें तो स्वाभाविक है की जीवन के लिए समय की आवश्यकता भय सी प्रतीत होगी और तब वह उसे स्वीकार करने के बजाये उनसे बचने का प्रयास करेगा।
सुरक्षित जीवन की आकांक्षा ही अपने आप में एक भ्रम है, ऐसा इसलिए, क्योंकि जीवन अपने स्वाभाव से ही अनिश्चित है पर मृत्यु निश्चित। अतः जीवन अपने प्रयासों का आधार एक सुरक्षित व् समृद्ध जीवन के आकांक्षा के बजाये एक तृप्त मृत्यु को बनाए तो वह सही अर्थों में सार्थक होगी।
ज्ञान की प्राप्ति की प्रक्रिया कोई साधना से कम नहीं और इसीलिए, किसी भी साधक के लिए उपवास, धैर्य और प्रयास की सततता को सीखना महत्वपूर्ण होता है; उपवास साधक को शारीरिक आवश्यकताओं को अपने वश में करना सिखाता है फिर वह चाहे भूख हो या प्यास, धैर्य व्यक्ति को उसकी सीमितता का बोध कराता है और साथ ही यह बतलाता है की इस श्रिष्टि में 'काल-चक्र' से बड़ा कोई नहीं ; प्रयास की सततता साधक की निष्ठां, समर्पण और आत्मविश्वास को प्रतिबिंबित करता है !
आज शिक्षा का मह्त्व केवल जीविका-उपार्जन की दृष्टि से एक सुरक्षित जीवन के आश्वासन के रूप में रह गया है; न सीखना महत्वपूर्ण रहा और न ही ज्ञान , तभी शिक्षा खुद एक व्यवसाय बन गयी है।
ज्ञान की भी एक सीमा है पर कल्पनाओं की कोई सीमा नहीं और इसीलिए शिक्षा के माध्यम से कल्पनाशक्ति को ज्ञान का बल प्रदान करना ही किसी भी नए सम्भावना का मूल स्त्रोत है, तभी तो, कल्पनाओं में ही नए को जन्म देने का सामर्थ है न की तार्किक क्षमता में , पर जब व्यवहारिकता के नाम पर लोग इतने समझदार हो जाएँ की सुनना, सोचना और समझना छोड़ दें तो स्वाभाविक है की जीवन के लिए समय की आवश्यकता भय सी प्रतीत होगी और तब वह उसे स्वीकार करने के बजाये उनसे बचने का प्रयास करेगा।
सुरक्षित जीवन की आकांक्षा ही अपने आप में एक भ्रम है, ऐसा इसलिए, क्योंकि जीवन अपने स्वाभाव से ही अनिश्चित है पर मृत्यु निश्चित। अतः जीवन अपने प्रयासों का आधार एक सुरक्षित व् समृद्ध जीवन के आकांक्षा के बजाये एक तृप्त मृत्यु को बनाए तो वह सही अर्थों में सार्थक होगी।
ज्ञान की प्राप्ति की प्रक्रिया कोई साधना से कम नहीं और इसीलिए, किसी भी साधक के लिए उपवास, धैर्य और प्रयास की सततता को सीखना महत्वपूर्ण होता है; उपवास साधक को शारीरिक आवश्यकताओं को अपने वश में करना सिखाता है फिर वह चाहे भूख हो या प्यास, धैर्य व्यक्ति को उसकी सीमितता का बोध कराता है और साथ ही यह बतलाता है की इस श्रिष्टि में 'काल-चक्र' से बड़ा कोई नहीं ; प्रयास की सततता साधक की निष्ठां, समर्पण और आत्मविश्वास को प्रतिबिंबित करता है !

इन सब गुणों का मह्त्व तब है जब शिक्षा की गुणवत्ता का स्तर समाज के लिए महत्वपूर्ण हो पर जब समाज कुंठित शिक्षा व्यवस्था से इतना संक्रमित हो जाये की समाज में 'पढ़े लिखे बैल ' अत्यधिक संख्या में पाये जाने लगे तो उस परिस्थिति में स्वभाविकतः भूख ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा ;
कोई चाहे इसे कुछ भी कह ले पर मेरी दृष्टि में यह समाज के वैचारिक पतन का प्रत्यक्ष प्रमाण है !
व्यवस्था परिवर्तन असम्भव नहीं पर यह तब तक सफलता पूर्वक नहीं किया जा सकता जब तक प्रयास का केंद्रबिंदु समस्याओं के मूल तत्व पर केंद्रित न हो; चूँकि आज की व्यवस्था प्रणाली जनतंत्र द्वारा शाषित है, इसलिए, जनतंत्र की सफलता जनता और जन प्रतिनिधियों के वैचारिक स्तर पर निर्भर करता है और शुरुआत भी हमें वहीँ से करनी होगी !
शाशन तंत्र की शक्तियों की उपयोगिता भी केवल उनके प्रयोग द्वारा ही सिद्ध की जा सकती है जिसका अधिकार जनतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधि को सौंपती है ; अतः इस दृष्टि से यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है की जनता अपने प्रतिनिधित्व के लिए कैसे लोगों का चयन करती है।
शाशन तंत्र भी अपनी शक्तियों का प्रयोग अथवा दुरूपयोग के लिए शाशक पर निर्भर करता है, इसलिए, अगर समाज अपने सचेतन निर्णय से सामाजिक नेतृत्व का दायित्व किसी मूर्ख व् अभिमानी को सौंप दे तो वह स्वतः ही विषम व्यवस्था की पात्र बन जाती है, और ऐसे में, शाशन तंत्र की शक्तियों को दोष देना व्यर्थ होगा !
यही कारन है की किसी भी राष्ट्र के परम वैभव में उसके शाशक की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। निम्न स्तर के नेतृत्व के बल पर किसी भी समाज के लिए यथार्थ में आदर्श का व्यावहारिक उदाहरण बन पाना संभव ही नहीं ; ऐसे किसी भी प्रयास का परिणाम केवल समय की व्यर्थता को ही सिद्ध करेगा; पर किसी भी गलती की सुधार के लिए उसकी स्वीकृति महत्वपूर्ण होती है ; जब तक हम अपने तर्कों से अपनी गलती को सही ठहराने का प्रयास करते रहेंगे, समस्याएं और जटिल होंगी ;
क्यों न हम अपने भ्रम से बाहर निकलकर वास्तविकता को स्वीकारें, शुरुआत तो यहीं से करनी पड़ेगी !"